काला पानी की सजा केवल एक जेल की सजा नहीं थी, बल्कि सामाजिक मृत्यु थी। ब्रिटिश राज के समय अंडमान के टापू पर बनी सेलुलर जेल को नरक कहा जाता था, जहाँ कैदियों को शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से तोड़ दिया जाता था।
1857 के विद्रोह के बाद, अंग्रेजों ने खतरनाक विद्रोहियों और अपराधियों को दूर-दराज अंडमान में भेजना शुरू किया। शुरुआत में उन्हें जंगल साफ़ कराने और सड़कें बनाने जैसे कठिन काम करवाए गए। बाद में यहीं से सेलुलर जेल का निर्माण हुआ — 696 सॉलिटरी सेल्स वाली ऐसी जगह, जहाँ कैदी एक-दूसरे को देख भी नहीं सकते थे।
अंग्रेजों ने कैदियों को काबू में रखने के लिए एक अनोखा प्रयोग किया — स्वयंवर परेड। पुरुष और महिला कैदियों की जबरन शादियाँ कराई गईं ताकि वे परिवार और जिम्मेदारियों में बँध जाएँ और उनका विद्रोही स्वभाव खत्म हो जाए। इस योजना से प्रेमनगर और शादीपुर जैसी बसाहटें बनीं, जहाँ जाति-भेद मिट गया और एक नया समाज पैदा हुआ।
1858 से 1939 के बीच 83,000 से ज्यादा भारतीय और बर्मी कैदी अंडमान भेजे गए। यह ब्रिटिश साम्राज्य की सबसे बड़ी पीनल कॉलोनी बन गई। आज सेलुलर जेल राष्ट्रीय स्मारक है, जबकि शादीपुर और प्रेमनगर की गलियाँ उस इतिहास की गवाही देती हैं कि कैसे मजबूरी में अजनबी कैदी परिवार बने और अंडमान के पहले बाशिंदे बन गए।





