बुधवार से शुरू हुई 56वीं जीएसटी परिषद की बैठक में विपक्ष शासित राज्यों ने राजस्व संरक्षण और उपभोक्ता हितों की सुरक्षा की मांग उठाई है। परिषद में प्रस्तावित जीएसटी दर सुधार के तहत कर प्रणाली को दो स्लैब — 5% और 18% — में सरल बनाने की तैयारी है। इससे रोज़मर्रा की जरूरत की वस्तुएं और इलेक्ट्रॉनिक सामान सस्ते हो सकते हैं, जबकि विलासिता की वस्तुओं पर टैक्स और ज्यादा बढ़ सकता है।
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राज्यों का कहना है कि कंपनियों को कम टैक्स दरों का फायदा खुद तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसका लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचना जरूरी है। इसके साथ ही वे एक स्पष्ट क्षतिपूर्ति योजना पर भी जोर दे रहे हैं, ताकि कर संरचना बदलने से उनके राजस्व में भारी कमी न आए। यहां तक कि कुछ भाजपा शासित राज्यों ने भी संभावित नुकसान की चिंता जताई है।
जब जीएसटी लागू हुआ था, तब केंद्र सरकार ने विलासिता और अहितकर वस्तुओं पर उपकर लगाकर राज्यों को पांच साल तक राजस्व हानि की भरपाई का वादा किया था, लेकिन यह व्यवस्था जून 2022 में समाप्त हो गई।
अब विपक्षी राज्य चाहते हैं कि किसी भी अतिरिक्त कर, खासकर विलासिता की वस्तुओं पर प्रस्तावित 40% टैक्स, का राजस्व सीधे राज्यों के खाते में जाए।
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विशेषज्ञों का मानना है कि राजस्व पर असर राज्यों के हिसाब से अलग-अलग होगा। बेकर टिली एएसए इंडिया एलएलपी के पार्टनर संदीप गुप्ता के अनुसार, “उपभोग-आधारित राज्यों को बढ़ी हुई मांग से फायदा मिल सकता है, लेकिन पंजाब, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे कर्ज़ग्रस्त राज्य जीएसटी राजस्व पर बहुत अधिक निर्भर हैं। मुआवज़ा नहीं मिलने पर उन्हें गंभीर संकट झेलना पड़ सकता है।”





